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धतूरा क्यों है जहरीला? जानें शरीर और दिमाग पर इसका असर

सावन और शिव पूजा के दौरान धतूरा भगवान शिव को चढ़ाने की परंपरा है। धार्मिक रूप से इसका विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि धतूरे को खाने या किसी घरेलू नुस्खे के तौर पर इस्तेमाल करना सुरक्षित है।

धतूरे के पौधे के अलग-अलग हिस्सों में ट्रोपेन एल्कलॉइड पाए जाते हैं। इनमें एट्रोपिन, स्कोपोलामाइन और हायोसायमीन प्रमुख हैं। ये शरीर में एसिटाइलकोलाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर की सामान्य क्रिया को रोककर एंटीकोलिनर्जिक विषाक्तता पैदा कर सकते हैं।

धतूरा शरीर में जाने के बाद मुंह सूखना, बहुत ज्यादा प्यास लगना, आंखों की पुतलियां फैलना, धुंधला दिखाई देना, तेज धड़कन और त्वचा का गर्म व सूखा होना जैसे लक्षण पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में भ्रम, बेचैनी, मतिभ्रम और डिलीरियम जैसी मानसिक स्थिति भी हो सकती है।

इसका असर केवल पाचन तंत्र तक सीमित नहीं रहता। जहरीले तत्व केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचकर दिमाग की सामान्य कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। अधिक गंभीर विषाक्तता में दौरे, बेहोशी, कोमा, सांस लेने में परेशानी और हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं।

धतूरे की विषाक्तता की मात्रा का अनुमान लगाना भी मुश्किल होता है, क्योंकि पौधे के अलग-अलग हिस्सों में जहरीले एल्कलॉइड की मात्रा अलग हो सकती है। इसलिए धतूरे के बीज, पत्ते, फूल या किसी अन्य हिस्से को खाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

बच्चों में इसका जोखिम और गंभीर हो सकता है। मेडिकल साहित्य में धतूरे के सेवन के बाद बच्चों में बेचैनी, पुतलियां फैलने और मतिभ्रम जैसे लक्षण सामने आए हैं। इसलिए घर में धतूरे के पौधे या उसके बीज हों तो उन्हें बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखना जरूरी है।

 अगर किसी व्यक्ति ने गलती से धतूरा खा लिया है और मुंह सूखने, असामान्य व्यवहार, तेज धड़कन, भ्रम, मतिभ्रम, बेहोशी या अन्य लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो इसे मेडिकल इमरजेंसी मानकर तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। धतूरे को धार्मिक रूप से चढ़ाना अलग बात है, लेकिन इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से खतरनाक हो सकता है।

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