Talaq-e-Hasan पर गुवाहाटी हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जानें क्या कहा कोर्ट ने

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने तलाक-ए-हसन को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि तलाक-ए-हसन एक वैध तलाक पद्धति है और मौजूदा कानून के तहत देश में इस पर प्रतिबंध नहीं है। अदालत का यह फैसला असम के एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया।
मामला बरपेटा निवासी एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया के तहत अपनी पत्नी से तलाक की बात कही थी। अदालत ने इस तरीके को वैध मानते हुए संबंधित व्यक्ति को असम में लागू विवाह एवं तलाक पंजीकरण संबंधी कानून के तहत तलाक का पंजीकरण कराने का निर्देश दिया।
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या तलाक-ए-हसन के जरिए किया गया तलाक कानूनी तौर पर स्वीकार्य है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक-ए-हसन को वर्तमान समय में देश में प्रतिबंधित तलाक की श्रेणी में नहीं रखा गया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर तलाक बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के स्वतः मान्य हो जाएगा।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि तलाक-ए-हसन और तत्काल तीन तलाक एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। वर्ष 2019 के केंद्रीय कानून के तहत ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी एक साथ तीन तलाक कहकर तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक देने की प्रथा को अवैध और दंडनीय बनाया गया है।
गुवाहाटी हाई कोर्ट के मौजूदा फैसले में तलाक-ए-हसन को वैध बताते हुए उसके पंजीकरण की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। यानी धार्मिक व्यक्तिगत कानून के तहत तलाक की प्रक्रिया और राज्य के कानून के तहत उसके आधिकारिक पंजीकरण—दोनों पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
असम में विवाह और तलाक के पंजीकरण से जुड़े राज्य कानून के तहत तलाक का रिकॉर्ड आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की व्यवस्था है। हाई कोर्ट ने संबंधित मामले में इसी कानूनी व्यवस्था के तहत पंजीकरण कराने का निर्देश दिया।
गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पारंपरिक मुस्लिम तलाक प्रक्रिया और आधुनिक वैधानिक पंजीकरण व्यवस्था के बीच संबंध को स्पष्ट किया गया है। हालांकि, किसी भी मामले में तलाक की वैधता तय करने के लिए संबंधित तथ्यों, लागू कानून और न्यायिक आदेश को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।




